विशेष रिपोर्ट: स्थापना के 14 साल बाद भी मुंगेली के विकास पर सवाल, क्या सिर्फ कागजों पर जिला बनकर रह गया है मुंगेली?

मुंगेली। 1 जनवरी 2012 को बिलासपुर से अलग होकर एक नए जिले के रूप में अस्तित्व में आया मुंगेली आज एक अजीब कशमकश से गुजर रहा है। जिला बने हुए एक दशक से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज भी हर मुंगेलीवासी की जुबान पर एक ही सवाल है— “क्या मुंगेली केवल कागजों पर जिला है?”
जनता पूछ रही है कि आखिर कब तक हमें एक अदद रेल लाइन, साफ-सुथरी आगर नदी और बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना होगा?
प्रशासनिक ढांचा खड़ा, पर सुविधाओं की नींव कमजोर
कहने को मुंगेली में कलेक्ट्रेट, एसपी ऑफिस, कोर्ट और एसडीएम कार्यालय जैसे तमाम प्रशासनिक दफ्तर मौजूद हैं। चकरभाठा जैसी नई उप-तहसीलें बनाकर काम को विकेंद्रीकृत करने की कोशिश भी हुई है, लेकिन जब बात धरातल पर सुविधाओं की आती है, तो मुंगेली अपने पड़ोसी जिले बिलासपुर की तुलना में कोसों दूर नजर आता है।
प्रमुख चुनौतियाँ: जो विकास की राह में रोड़ा हैं
- रेलवे का अभाव: मुंगेली की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिला मुख्यालय होने के बावजूद यहाँ अपना रेलवे स्टेशन नहीं है। आज भी लोगों को ट्रेन पकड़ने के लिए 55 किमी दूर बिलासपुर जाना पड़ता है।
- कृषि पर अत्यधिक निर्भरता: जिले की 90% आबादी खेती-किसानी पर टिकी है। औद्योगिक विकास शून्य के बराबर होने के कारण युवाओं के पास पलायन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
- आगर नदी की बदहाली: मुंगेली की जीवनदायिनी मानी जाने वाली आगर नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। नदी के संरक्षण और सफाई को लेकर जनता में भारी असंतोष है।
विकास की धीमी रफ्तार और सरकारी प्रयास
हालांकि, प्रशासन का दावा है कि सुधार के प्रयास जारी हैं। ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़कों का जाल और डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में काम हुआ है। हाल ही में सुदूर अंचलों के लिए शुरू की गई ‘मोबाइल मेडिकल यूनिट’ जैसी पहलों से स्वास्थ्य सेवाओं में कुछ सुधार जरूर दिखा है, लेकिन एक ‘विकसित जिला’ कहलाने के लिए ये कोशिशें नाकाफी लग रही हैं।
जनता की मांग: घोषणा नहीं, धरातल पर काम चाहिए
मुंगेली, पथरिया और लोरमी—इन तीनों विकासखंडों की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं है। लोगों का कहना है कि जब तक मुंगेली रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ता और यहाँ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा नहीं होते, तब तक इसे पूर्ण रूप से जिला कहना बेमानी होगा।
निष्कर्ष: मुंगेली में संभावनाएं अपार हैं, लेकिन इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति और बड़े विजन की जरूरत है। अब देखना यह है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि कब तक जनता के इन तीखे सवालों का ठोस जवाब दे पाते हैं।





