राजधानी में संस्कृत विद्वानों का विराट सम्मेलन सम्पन्न

राजधानी स्थित सरयूपारीण ब्राह्मण सभा भवन में संस्कृत भारती के तत्वावधान में संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन हेतु विराट सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों से हजारों संस्कृत विद्वान और शिक्षक सम्मिलित हुए।
कार्यक्रम का शुभारंभ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह की उपस्थिति में हुआ। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि विचार, संस्कार और विश्व कल्याण की धारा है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना संस्कृत से ही प्रकट होती है। उन्होंने कहा कि वेद, शास्त्र, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत जैसे अमूल्य ग्रंथ संस्कृत में रचित हैं और यह भाषा सम्पूर्ण विश्व को जोड़ने की क्षमता रखती है।
सम्मेलन के समापन सत्र में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति हमारी आत्मा है और संस्कृत उसका आधार है। पुराणों और उपनिषदों के ज्ञान को आत्मसात कर ही हम अपनी विरासत को जीवन में उतार सकते हैं। मुख्यमंत्री ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार पर बल देते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों को संस्कृत साहित्य से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
इस अवसर पर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय फास्टरपुर में पदस्थ संस्कृत व्याख्याता डॉ. रामबाबू मिश्र ने कहा कि वर्तमान में कक्षा नवमी और दसवीं में संस्कृत को वैकल्पिक रखा गया है, जबकि इसे पुनः कक्षा पहली से बारहवीं तक तृतीय भाषा के रूप में अनिवार्य किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग रखी कि प्रदेश के सभी महाविद्यालयों में संस्कृत विभाग खोले जाएं तथा एक संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए।
मुंगेली जिले से संस्कृत भारती के जनपद संयोजक डॉ. रामबाबू मिश्र के मार्गदर्शन में सम्मेलन में बड़ी संख्या में विद्वान पहुंचे। इसमें विजय कुमार, बुधेश्वर उपाध्याय, राजेश साहू, वीरेन्द्र मिश्र, बीरबल सोनकर, गोविंद पाण्डेय, कैलाश सिंह छत्री, प्रतिमा पांडेय, प्रभा वैष्णव, रुद्र बंजारा, विनोद राजपूत, अखिलेश्वर, पीतांबर सिंह हथनी कला, चिंतामणि तिवारी, नीलकंठ तिवारी, रामनिवास राजपूत, रोशन राजपूत, उमाशंकर राजपूत, रवीन्द्र राजपूत, दीपक तिवारी, राजेन्द्र सिन्द्राम, आई.पी. कुलमित्र, घनश्याम दास वैष्णव, दीपा दुबे, विनोद दुबे, रितेश यादव, शेषकुमार पांडेय सहित अनेक विद्वानों की विशेष उपस्थिति रही।
सम्मेलन में मुंगेली जिले के वरिष्ठ समाजसेवी भी सम्मिलित हुए, जिससे यह आयोजन और भी गरिमामय बन गया। संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन का यह प्रयास सभी विद्वानों ने ऐतिहासिक और प्रेरणादायक बताया।





