खबरदार 36.com विशेष रिपोर्ट ✍️कहते हैं कि बहता पानी हमेशा साफ रहता है, लेकिन जो पानी एक ही जगह ठहर जाए, उसमें काई जमने लगती है। ठीक यही स्थिति इस समय क्षेत्र के कई सरकारी विभागों की हो चुकी है। जब कोई अधिकारी या कर्मचारी वर्षों तक एक ही जिले, एक ही दफ्तर या एक ही मलाईदार कुर्सी पर जमा रहता है, तो धीरे-धीरे उसके चारों तरफ प्रभाव, पहुंच और स्वार्थ के रिश्तों का ऐसा जाल बन जाता है, जिसे भेद पाना आम जनता के बस की बात नहीं रह जाती।
विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो लंबे समय तक एक ही जगह पर टिके रहने वाले कुछ अधिकारी और कर्मचारी अपने विभाग को जनसेवा का केंद्र कम और अपने रसूख का गढ़ ज्यादा बना लेते हैं। समय के साथ व्यवस्था पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत हो जाती है कि सरकारी फाइलें भी अब जनहित के बजाय उनके इशारे पर आगे बढ़ती हैं। नियमों की व्याख्या भी आम नागरिकों के हित में होने के बजाय, इन रसूखदारों की खुद की सुविधा के अनुसार की जाने लगी है। कई बार नए आने वाले उच्च अधिकारी भी इस पुराने और शातिर नेटवर्क के सामने बेबस नजर आते हैं।
नेताओं और दलालों का अभेद्य ‘कवच’
प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा आम है कि ऐसे ‘अंगद’ की तरह पैर जमाए बैठे चेहरों को कुछ स्थानीय नेताओं, दलालों और प्रभावशाली लोगों का सीधा संरक्षण प्राप्त है। यही वजह है कि शासन स्तर से स्थानांतरण की सूचियां बनती हैं, बकायदा आदेश जारी होते हैं, लेकिन जुगाड़ और सेटिंग के दम पर कई चेहरे सालों-साल उसी कुर्सी पर बरकरार रहते हैं। सवाल उठता है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी या बड़ी ‘डील’ है, जिसके कारण कुछ कुर्सियां और कुछ चेहरे एक-दूसरे से अलग ही नहीं हो पा रहे हैं?
गरीब और किसान काट रहे चक्कर, रसूखदारों के काम चुटकियों में
इस पूरी दूषित व्यवस्था का सबसे मारक असर आम जनता पर पड़ रहा है। ग्रामीण अंचलों से आने वाले गरीब, किसान और मजदूर, जिन्हें पेचीदा प्रशासनिक नियमों की जानकारी नहीं होती, वे अदद काम के लिए दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक रहे हैं। उनकी छोटी-छोटी और पूरी तरह जायज समस्याएं भी महीनों तक फाइलों में दबाकर रखी जाती हैं। इसके विपरीत, रसूख, पहुंच और सही ‘पहचान’ वाले लोगों के काम बिना किसी अड़चन के चुटकियों में निपटा दिए जाते हैं।
जवाबदेही खत्म, पारदर्शिता पर संकट
आम चौक-चौराहों और चाय की टपरियों पर भी अब यह मुद्दा गर्माने लगा है। प्रबुद्ध जनों का कहना है कि जहां नियमित और पारदर्शी स्थानांतरण नहीं होता, वहां पूरी व्यवस्था की रीढ़ कमजोर हो जाती है। विभाग के भीतर से जवाबदेही पूरी तरह गायब हो जाती है और भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का खुला मैदान मिल जाता है।
बड़े सवाल: क्या बदलेगी व्यवस्था?
- क्या सरकारी विभागों में एक निश्चित समय सीमा के बाद अनिवार्य स्थानांतरण की व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाएगा?
- क्या वर्षों से एक ही सीट पर कुंडली मारकर बैठे अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यशैली और संपत्ति की उच्च स्तरीय समीक्षा होगी?
- क्या आम जनता को इस प्रशासनिक मकड़जाल से राहत दिलाने के लिए शासन स्तर पर किसी बड़े सुधार की पहल की जाएगी?

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